फर्जी FIR में आरोपी के बरी होने पर राज्य सरकार ने की थी हाईकोर्ट में अपील
जबलपुर। एससी–एसटी एक्ट जैसे गंभीर कानून के दुरुपयोग पर मप्र हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमे सीधी की विशेष अदालत द्वारा एक दुकानदार को बरी किये जाने को चुनौती दी गई थी। जस्टिस बीपी शर्मा की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि साड़ी वापस न लेने की नाराज़गी में पीड़िता द्वारा दुकानदार के खिलाफ एफआईआर न केवल देर से दर्ज हुई, बल्कि पूरी तरह अविश्वसनीय और मनगढ़ंत भी है।
क्या था मामला?
सीधी जिले के कुसमी थानांतर्गत भगवारपुर तिराहे पर बबलू उर्फ़ अनिल गुप्ता की कपडे की दुकान पर पीड़िता 9 दिसंबर 2010 को साड़ी खरीदने गई थी। 10 दिसंबर को वह साड़ी वापस करने गई। पीड़िता का आरोप था कि दुकानदार ने साड़ी तो वापस नहीं ली, अलबत्ता बुरी नियत से उसने उसको हाथ पकड़कर दुकान के अंदर ले जाने की कोशिश की। 13 दिसंबर 2010 को थाने में FIR दर्ज कराई गई। सीधी की विशेष न्यायालय ने 30 अप्रैल 2016 को आरोपी को IPC की धारा 354 और एससी–एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(11) से बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने यह अपील वर्ष 2016 में दाखिल की थी।
दुकानदार ने साड़ी वापस लेने से मना किया था
अपने फैसले में अदालत ने कहा- पीड़िता ने खुद स्वीकार किया कि वह आरोपी से इसलिए नाराज़ थी क्योंकि उसने दुकान से खरीदी गई साड़ी वापस लेने से मना कर दिया था। इसी नाराज़गी में तीन दिन बाद एफआईआर दर्ज कराई गई। इस देरी के लिए कोई ठोस कारण नहीं बताया गया।
हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि एफआईआर में देरी अभियोजन के लिए घातक है। किसी भी गवाह ने आरोपों का समर्थन नहीं किया। पीड़िता का आचरण और बयान संदेह के घेरे में है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष दुकानदार का अपराध संदेह से परे सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा और ट्रायल कोर्ट द्वारा उसको बरी करने का फैसला बिल्कुल सही था। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर साफ कर दिया कि आपसी रंजिश को निपटाने के लिए गंभीर कानूनों का इस्तेमाल हथियार के रूप में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
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